संवत्‍सर व्‍याख्‍यान

साहित्य अकादेमी के वार्षिक व्याख्यान को संवत्सर व्याख्यान का नाम दिया गया है। यह व्याख्यान ऐसे लब्धप्रतिष्ठ लेखक या सर्जनशील विचारक द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, जिसने भारतीय साहित्य का गहरा अध्‍ययन किया हो। इस बात पर बल दिया जाता है कि इन व्याख्यानों में मूल्यों के प्रति गहरी चिन्ता व्यक्त हो तथा ये किसी नए साहित्यिक आंदोलन, वर्तमान साहित्यिक प्रवृत्ति के विषय में चिन्तन के नए परिदृश्य उद्धाटित करें, किसी रचनाकार या महान कृति के बारे में मौलिक विचार प्रस्तुत करें या साहित्यिक समालोचना अथवा सर्जना के नए द्वार खोलें।


अब तक निम्नलिखित विद्वानों ने संवत्सर व्याख्यान प्रस्तुत किए हैं :


  • श्री स. ही. वात्स्यायन 'अज्ञेय' ने 12 मार्च 1986 को स्मृति के परिदृश्य विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया।
  • श्री अन्नदा शंकर राय ने 21-22 फ़रवरी 1987 को इन रेट्रास्पेक्ट विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया।
  • प्रो. उमाशंकर जोशी ने 19-20 फ़रवरी 1988 को द आइडिया ऑफ़ इंडियन लिटरेचर विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया।
  • प्रो. के.आर. श्रीनिवास आयंगर ने 18-19 फ़रवरी 1989 को द मैन ऑफ़ लेटर्स एंड द डूम्स डे क्लाक विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया।
  • प्रो. के. शिवराम कारंत ने 20-21 फ़रवरी 1990 को माई कन्सर्न फ़ॉर लाइफ़, लिटरेचर एंड आर्ट विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया।
  • श्री विन्दा करंदीकर ने 17-18 फ़रवरी 1991 को लिटरेचर एज़ द वाइटल आर्ट विषय पर व्याख्यान दिया।
  • डॉ. आले अहमद सुरूर ने 23-24 फ़रवरी 1992 को हैज़ लिटरेचर फ़ेल्‍ड? द यूनिवर्सल एलीमेंट इन लिटरेचर : ग़ालिब विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया।
  • प्रो. विद्यानिवास मिश्र ने 18-19 फ़रवरी 1993 को सहृदय विषय पर व्याख्यान दिया।
  • डॉ. नवकांत बरुआ ने 16-17 फ़रवरी 1994 को फोकवेज़ इन लिटरेचर : एन एस्थेटिक इम्पेरेटिव विषय पर व्याख्यान दिया।
  • डॉ. सीताकांत महापात्र ने 22-23 फ़रवरी 1995 को पोएट्री एंड पैशन : द सर्च फ़ॉर द वॉयस विषय पर व्याख्यान दिया।
  • श्री निर्मल वर्मा ने 24-25 फ़रवरी 1996 को तथा श्रोताओं की माँग पर 19-20 फ़रवरी 1997 को दोबारा द कंसेप्ट ऑफ़ ट्रूथ इन आर्ट विषय पर व्याख्यान दिया।
  • श्री सुभाष मुखोपाध्‍याय ने 12-13 मार्च 1998 को इंडियन पोयट्री ऑफ़्टर इंडिपेंडेंस : टुवड्र्स ए हिस्ट्री ऑफ़ सेंसिबेलिटी विषय पर व्याख्यान दिया।
  • श्री एम. टी. वासुदेवन नायर ने 24-25 फ़रवरी 1999 को द फ्रंटियर्स ऑफ़ फि़क्‍श्‍ान विषय पर व्याख्यान दिया।
  • श्री कुँवर नारायण ने 23 फ़रवरी, 2000 को लिटरेचर एंड न्यू इकोनोमिक क्रिटिसिज्‍़म विषय पर व्याख्यान दिया।
  • श्री निरंजन भगत ने 21 फ़रवरी 2001 को अपराधी और हत्यारे : एक व्यक्तिगत दृष्टिकोण विषय पर व्याख्यान दिया।
  • प्रो. सी.डी. नरसिम्हय्या ने 18 फ़रवरी 2003 को एन इन्क्वायरी इन टू द इंडियन इंग्लिश लिटरेचर विषय पर व्याख्यान दिया।
  • प्रो. गोविन्द चंद्र पांडेय ने 25 फ़रवरी 2004 को साहित्य और चेतना विषय पर व्याख्यान दिया।
  • प्रो. के. अय्यप्प पणिक्कर ने 17 फ़रवरी 2005 को कई धाराओं द्वारा पोषित नदी की तरह : संस्कृतियों के संगम पर चिन्तन-मनन विषय पर व्याख्यान दिया।
  • श्री गिरीश कार्नाड ने 22 फ़रवरी 2006 को संस्कृति, उपनिवेशवाद, जाति, वर्ग आदि विषय पर व्याख्यान दिया।
  • प्रो. यू.आर. अनंतमूर्ति ने 21 फ़रवरी 2007 को मेरे लेखन के पाँच दशक विषय पर व्याख्यान दिया।
  • श्री मनोज दास ने 24 फ़रवरी 2008 को सृजनात्मक प्रेरणा के छह स्रोत : कल और आज विषय पर व्याख्यान दिया।
  • श्री अमिताव घोष ने 18 फ़रवरी 2009 को आज के समय में वेदांत विषय पर व्याख्यान दिया।
  • डॉ. कर्ण सिंह ने 17 फ़रवरी 2010 को आज के समय में वेदांत विषय पर व्याख्यान दिया।
  • डॉ. ए.पी.जे. अब्‍दुल कलाम ने 16 फ़रवरी 2011 को ज्ञान के संसार की यात्रा विषय पर व्याख्यान दिया।
  • श्री सुरजीत पातर ने 15 फ़रवरी 2012 को काव्‍य और प्रकृति विषय पर व्याख्यान दिया।
  • श्री भालचंद नेमाडे ने 19 फ़रवरी 2013 को एक भारतीय लेखक को कितनी जगह चाहिए? विषय पर व्याख्यान दिया।
  • प्रो. ओ. एन. वी. कुरुप, 2014
  • डॉ. आशिष नंदी, 2015
  • डॉ. चंद्रशेखर धर्माधिकारी, 2016
  • डॉ. रामचंद्र गुहा, 2017
  • डॉ. एस. एल. भैरप्पा, 2018
  • प्रो. गोपीचंद नारंग, 2019

  • अकादेमी ने उक्त समस्त व्याख्यानों को पुस्तक रूप में प्रकाशित किया है। अंतिम व्याख्यान को भी शीघ्र ही पुस्तक रूप में प्रकाशित किया जाएगा।